
उत्तर प्रदेश की राजधानी Lucknow के आशियाना इलाके में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने पारिवारिक रिश्तों की नींव पर सवाल खड़े कर दिए।
49 वर्षीय शराब कारोबारी मानवेंद्र सिंह की हत्या के आरोप में उनके 21 वर्षीय बेटे अक्षत प्रताप सिंह को पुलिस ने घटनास्थल पर ले जाकर पूरा क्राइम सीन रिक्रिएट कराया।
रीक्रिएशन के दौरान आरोपी के चेहरे पर न अपराधबोध, न हिचक। उसने विस्तार से बताया कि कैसे गुस्से में पिता की लाइसेंसी राइफल उठाई और गोली चला दी।
NEET का दबाव या बहाना?
पूछताछ में अक्षत ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET की तैयारी का दबाव वजह बताया। उसका कहना था कि पिता लगातार पढ़ाई के लिए टोकते थे, जबकि उसका मन तैयारी में नहीं लगता था। चार साल से चल रही तकरार उस सुबह विस्फोट बन गई। बहस हुई, गुस्सा बढ़ा और तीसरी मंजिल पर चली गोली ने सब कुछ खत्म कर दिया।
यहां सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि उस मानसिक दबाव का भी है जो प्रतियोगी परीक्षाओं के नाम पर युवाओं के कंधों पर रखा जाता है। लेकिन दबाव कभी भी हत्या का औचित्य नहीं बन सकता।
नीले ड्रम का काला सच
हत्या के बाद जो हुआ, उसने पुलिस को भी चौंका दिया।
आरोपी ने शव को घसीटकर नीचे लाया, आरी खरीदी और टुकड़े कर दिए। हाथ-पैर अलग ठिकाने लगाए, जबकि धड़ और सिर को नीले प्लास्टिक ड्रम में भरकर छत पर छिपा दिया।
इसके बाद खुद ही गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। पड़ोसियों के साथ मिलकर खोज अभियान चलाया, व्हाट्सएप ग्रुप बनाया, ताकि शक की सुई उसकी ओर न घूमे।

लेकिन घर के आसपास लगे CCTV कैमरों ने कहानी बदल दी।
क्राइम सीन रिक्रिएशन में खुलासे
पुलिस जब आरोपी को मौके पर लेकर पहुंची, तो उसने सिलसिलेवार ढंग से पूरी वारदात दोहराई। फोरेंसिक टीम ने मौके से अहम साक्ष्य जुटाए हैं। हत्या में इस्तेमाल राइफल बरामद कर ली गई है। शव के कुछ हिस्से मिल चुके हैं, जबकि सिर की तलाश जारी है।
पुलिस का कहना है कि साक्ष्यों की कड़ी मजबूत है और चार्जशीट जल्द दाखिल की जाएगी।
पारिवारिक तकरार से अपराध तक
हर परिवार में मतभेद होते हैं। हर युवा पर करियर का दबाव होता है। पर गुस्से की एक चिंगारी जब कानून की सीमा लांघती है, तो वह सिर्फ एक अपराध नहीं, सामाजिक विफलता का आईना भी बन जाती है।
यह मामला याद दिलाता है कि संवाद की जगह जब हिंसा ले लेती है, तो परिणाम सिर्फ विनाश होता है। लखनऊ का यह केस अब अदालत में अपनी दिशा पाएगा, लेकिन एक सवाल समाज के सामने छोड़ गया है क्या हम बच्चों से सपने मांगते-मांगते उनका संतुलन छीन रहे हैं?
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